गुजरात में अब कुछ भी हो सकता है

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चंदन प्रताप सिंह, न्यू मीडिया- गुजरात चुनाव के नतीजों को लेकर पार्टियां, नेता और सटोरिए चाहें जो भी अनुमान निकालें लेकिन मैं एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि दुनिया के मशहूर काल्पनिक जासूस शेरलॉक होम्स भी सही जानकारी नहीं दे पाएंगे। क्योंकि इस बार के विधानसभा चुनाव में कुछ भी सीधा-सादा नहीं है। इसकी वजह बेहद साफ है। गुजरात के गौरव नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के धुआंधार प्रचार के बाद पार्टी के लिए सत्ता में लौटना पहले की तरह आसान नहीं है। कई कारणों ने बीजेपी की राह में अड़चन पैदा कर दी है। 

चुनाव अभियान की शुरूआत के दो पखवाड़े बाद से ही कुछ चीजें बिल्कुल साफ हैं। 22 साल से सत्ता में बने रहना एक तरह से एंटी इनकॉम्बेंसी फैक्टर बन गया है। तीन युवा नेताओं का ताल ठोंकना भी मुसीबत का सबब है। तीसरा सबसे अहम बात की राहुल गांधी अब पप्पू नहीं रहे। यूपी का चुनाव और यादव घराने की दोस्ती ने उन्हें असली राजनीति के दांवपेंच सीखा दिए हैं। शाह और मोदी को राहुल कहीं भी वोट मांगने का मौक़ा ही नहीं दे रहे। विकास पगला गया है, पाटीदारों का आरक्षण, गब्बर सिंह टैक्स यानी जीएसटी, नोटबंदी, कालाधन, अंबानी –अडानी-टाटा, जय शाह-राफेल और बेरोज़गारी जैसे उनके वादों को याद दिलाकर राहुल ने मोदी को उन्हीं के गढ़ में जुमलेबाज़ और जादूगर साबित कर दिया है।

दूसरी बात कि हिंदुत्व के जुमले की जगह जातिगत पहचान के मुहावरे ने ले ली है। इस तरह बीजेपी से उसका सबसे बड़ा हथियार छिन गया है। फिर भी अमित शाह डेढ़ सौ सीट जीतने का दावा कर रहे हैं।

शरलॉक होम्ज ने कहा था कि सबसे बड़ा पाप है बिना डेटा के सिद्धांत बघारना। पूरे तथ्य सामने ना हो तो सिद्धांत बचाने के ख्याल से आदमी मौजूदा तथ्यों में ही तोड़-मरोड़ करने लगता है। जबकि होना चाहिए इसका उल्टा. सिद्धांत तथ्यों के हिसाब से बदले जाने चाहिए। शाह का ये सिद्धांत दो अहमतथ्यों की अनदेखी पर टिका है। एक तो यह कि राहुल गांधीहार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर को सुनने के लिए भारी भीड़ जुट रही है। दूसरी बात यह कि बीजेपी अभी तक अपने चुनावी अभियान का मुहावरा नहीं तय कर पाई है। बीजेपी अब केवल राहुलहार्दिकअल्पेश और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी के आरोपों का जवाब देते घूम रही है।  

बीजेपी सियासत के आसमान में अपनी पसंद के गुब्बारे उड़ा रही है। वो कश्मीरपाकिस्तान और रोहिंग्या जैसे मुद्दे उछालकर बीच-बीच में चुनावी फिजां में तैराने लगती है। नवसारी में अमित शाह ने तो ये जुमला उछाला कि हम गुजरात को कर्फ्यू-मुक्त जिंदगी देंगे। बीजेपी की चुनावी रैलियों में हिंदुत्व वाले गीत बज रहे हैं। इन गीतों के बोल हैं राजनीति की करो तैयारीआते हैं अब भगवाधारी कांग्रेस अपने बदले अवतार में हिंदुत्व की बहस से एकदम दूर है। मुस्लिम समर्थक होने के ठप्पे से छुटकारा पाने के लिए राहुल गांधी मंदिरों में जा रहे हैं। भगवान शंकर का नाम ले रहे हैं। सभाओं में माथे पर सिंदूर तिलक लगाये नजर आ रहे हैं। वो अब गुजरात दंगे का जिक्र नहीं करते। उनके भाषणों में अर्थव्यवस्थाबेरोजगारीदलितपाटीदार और अन्य जाति समुदाय के लोगों के सपनों और महत्वाकांक्षाओं का जिक्र आता है।

मतदान के रुझान से भी कांग्रेस को कुछ उम्मीद है। साल 2012 के गुजरात चुनाव में जब नरेंद्र मोदी की नजर दिल्ली पर थी तब कांग्रेस को बीजेपी से 9 फीसदी कम वोट मिले थे। इस बार के चुनाव में कांग्रेस को अलग से तीन नेताओं का समर्थन हासिल । ये नेता मतदान का रुख कांग्रेस की तरफ मोड़ सकते हैं। गुजरात में 20 फीसद ठाकोर वोट है। 15 फीसद पाटीदार हैं। 7 फीसद दलित मेवाणी आबादी है। ये सारे गणित और राहुल के बदले तेवर ने 9 फीसदी के फासले को घटाकर लगभग ढाई-तीन फीसद पर ला खडा किया है। लेकिन ये भी सच है कि मोदी भी कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं है। नरेंद्र मोदी को उनके ही घरेलू मैदान पर पटखनी देना आसान भी नहीं है। मुमकिन है कि आखिरी लम्हों में मोदी कुछ ऐसा कर जाएं कि वो कांग्रेस से तीन फीसदी फासला और बढ़ा ले जाएं। ऐसे मेरा मानना है। लेकिन ये भी सच ह कि राजनीति में भी क्रिकेट की तरह कुछ भी असंभव नहीं है। इसलिए आखिरी गेंद तक इंतज़ार करना होगा।

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