karma-भगवन कृष्ण कहते है, कर्म किये बिना कोई रह नहीं सकता bhagwat geeta in hindi

दूसरों के साथ साझा करें

karma , कर्म

Krishna on karma/ karm ( कर्म पर, भगवन कृष्ण क्या कहते है ) bhagwat geeta in hindi

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

Lord krishna Images
krishna to arjun on karm or say karma कर्म

राजकुमार:नई दिल्ली“विचार” कुछ हमारे, कुछ तुम्हारे। आप तैयार हैं। आओ, तो ‘कर्म’ पर अपने विचारों को रखते हैं।

कर्म (karm ) किये बिना कोई रह नहीं सकता। आप कार्य करोगे या नहीं करोगे। दोनों ही कर्म प्रधान हैं। एक कार्य आपको यश की ओर ले जाएगा और दूसरा कार्य अपयश की ओर। लेकिन, कर्म दोनों में ही करना होगा।

कार्य सिर्फ एक व्यक्ति नहीं कर सकता, जो व्यक्ति नहीं रहता, अर्थात जिसका शरीर निर्जीव हो गया हो, अर्थात जो भगवान को प्यारा हो गया है, अर्थात जिसके शरीर से ‘आत्म’ तत्व निकल गया हो, अर्थात जिसकी मृत्यु हो गई हो- सिर्फ मृत शरीर ही कर्म से मुक्ति पा सकता है।

कर्म की परिभाषा

कर्म के प्रकार

कर्म का सिद्धांत

कर्म का अर्थ

कर्म क्या है

कर्म का फल

कर्म के भेद

कर्म का महत्व

‘कर्म’ karma का सत्य अनादिकाल से चला आ रहा। महापुरुष, समय-समय पर इस सत्य को सरल शब्दों में समझाते आ रहे हैं। कुछ काल खंडों में मनुष्य जब इस सिद्धांत को भूल जाता है तथा महापुरुषों की वाणी से विश्वास उठने लगता है, चारो ओर अराजकता का माहौल पैदा हो जाता है, तो स्वयं भगवान, जीवों के कल्याण के लिए धरती पर अवतरित होते हैं।

एक कार्य आपको यश की ओर ले जाएगा और दूसरा कार्य अपयश की ओर। लेकिन, कर्म karmaदोनों में ही करना होगा।

धर्मक्षेत्र अर्थात कुरुक्षेत्र के मैदान में, युद्ध की अभिलाष लिए एकत्रित योद्धाओं में से एक महान योद्धा जब अपना धर्म अर्थात क्षत्रिय धर्म भूलने लगता है तो उस समय, उस महान योद्धा ‘अर्जुन’ के सारथी बने भगवान ‘श्रीकृष्ण’ अपना सारथी धर्म निभाते हुए, अर्जुन को अपने क्षत्रिय धर्म से भटकने नहीं देते। अर्जुन मोहवश होकर अपने क्षत्रिय धर्म से पीछे हट जाना चाहता है और इसके लिए वो भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न करने लगता है और हर प्रश्न के बाद अर्जुन की जिज्ञास बढ़ने लगती है। लेकिन सारथी रूप में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को माध्यम बनाकर संसार के सामने एक ऐसा ज्ञान रखते है, जो सभी प्राणियों के जीवन को सरल व सुखमय बनाने वाला है।

karma
karma, कर्म

अर्जुन युद्ध से पूर्व दोनों सेनाओं को अच्छी तरह देखने की चाह में सारथी बने श्रीकृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलने के लिए कहता है। भगवान श्रीकृष्ण (krishna) रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर रोक देते हैं। अर्जुन दोनों सेनाओं को देखते हुए कहता है कि मधुसूदन, ये दो सेनाएं नहीं ये तो महासमुद्र है जो अपनी सीमाएं लांघ कर सुबकुछ मिटा देना चाहता है। इसके बाद अर्जुन अपने सगे सम्बधियों को देखने व पुरानी यादों में खो जाता है। तब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को संबोधन कर उसकी यादों को भंग कर देते हैं। तब अर्जुन कहता है कि आज के बाद फिर हम शायद इन योद्धाओं को न देख पाएं इसलिए इन योद्धों को देखने दो और अगले ही क्षण अर्जुन को अहसास होता है कि किन से युद्ध करने आया हूं। युद्ध के मैदान में सामने खड़े योद्धओं में तो मेरे सगे संबंधी, रिश्तेदार, तात, गुरु, भाई, चाचे, मामे, मित्र आदि हैं-केशव। इनसे युद्ध करके मुझे कुछ भी लाभ नज़र नहीं आ रहा। मेरा अंग-अंग शिथिल हुआ जा रहा है। मेरा मुंह सुखा जा रहा है। मैं इस रणभूमि को अपने ही वंश की शमशान भूमि नहीं बना सकता आदि आदि कहते हुए धनुषबाण रख देता है।

भगवान श्रीकृष्ण (krishna), अर्जुन को कहते हैं कि विनाश के बादल चारों और से उमड़ आए हैं- धर्म, रक्षा और विजय की आस लिए तुम्हारी ओर देख रहा है, इस संकट की घड़ी में तुमने कायरता के हीन भावों को अपने हृदय में आने कैसे दिया? श्रेष्ठ पुरुष तो यूं विषाद में डुबा नहीं करते। धर्म और अधर्म की इस घड़ी में नापुंसक न बनो। हे परंपतप, हे शत्रुसंघारक, हे धन्जय तुम्हारे ये भाव अनार्य हैं। ये तुम्हें स्वर्ग से गिरा देंगे और कीर्ति से भी और तुम स्वयं ही अपने तिरस्कार का कारण बनकर रह जाओगे, हृदय की इस दुर्बता को त्यागो और युद्ध के तैयार हो जाओ। ये युद्ध रिश्तेदारों, संबंधों, चाचओं व तात व भाईयों के बीच का नहीं है। अपने कर्तव्य को पहचान कर निर्णय करना पार्थ। ये युद्ध तुम्हारा है-पार्थ। इसका निर्णय भी तुम्हें ही लेना होगा। मैं सारथी धर्म निभा रहा हूं और तुम्हें मार्ग पर लाने, सत्य और असत्य, धर्म व अधर्म, अच्छाई व बुराई आदि का अन्तर तो समझा सकता हूं। तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर भी दे रहा हूं, लेकिन समझना और न समझना तो तुम्हें ही पड़ेगा-पार्थ। क्योंकि यह युद्ध तुम्हारा है और इसका परिणाम भी तुम्हारा ही होगा।

पार्थ,जो चले गए सो चले गए, ज्ञानी लोग इसका शोक नहीं करते। तुम्ह बातें तो ज्ञानियों जैसी करने का प्रयास कर रहे हो, लेकिन कह मुर्खो की भांति रहे हो। पार्थ, जिनके लिए तुम शोक करना चाहते हो, क्या वो शोक के योग्य हैं भी के नहीं?  पार्थ इस सत्य को जितनी जल्दी समझ लोगे कि मूल तत्व शरीर नहीं, आत्मा है, तभी तुम्हारा कल्याण होगा। अंतिम पड़ाव मृत्यु भी नहीं, क्योंकि आत्मा की यात्रा तो अनंत है।

कर्म(karma), केवल कर्म करो, लाभ-हानि, विजय-पराजय के मोह में हमें नहीं भटकना है। समाज हित में कर्म करते समय यदि अपना हित सामने रखते हैं तो वह कर्म शुद्ध नहीं होगा। इसलिए हमें फल की इच्छा को त्याग कर कर्म करना चाहिए। अर्थात निष्काम कर्म के मार्ग पर चलना ही श्रेष्ट है। क्योंकि कर्म के फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। तुम्हारा अधिकार कर्म करने में। अपना धर्म निभाने में है। कर्म फल की इच्छा ही बुराईयों को जन्म देती है। कर्म के बिना जीवन संभव नहीं है। कुछ तो करना ही होगा। कार्य करोगे अथव नहीं करोगे। दोनों में से एक कर्म तो करना ही होगा। तुम्हारे पास करो या न करो का विकल्प है, कर्म फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। अगर तुम चाहो की इसका फल हमें यह मिलेगा और चाहने के बाद भी फल नहीं भी मिल सकता अर्थात तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है फल पर नहीं। अगर हम कर्म के फल में मोहित नहीं होंगे तो फल न मिलने पर निराश भी नहीं होंगे। यदि हम यह सोचें कि कर्म तो मुझे करना ही है-फल मिले या न मिले, फिर आप सभी चिन्ताओं से मुक्त हो जाओगे-पार्थ। इस समय जीत-हार से की चिन्ता छोड़ो और अपना क्षत्रिय धर्म निभाओं और युध करो।  इस प्रकार सोचने वाला व्यक्ति ‘कर्म योगी’  कहलाता है। कर्मयोगी बनो। कर्मयोगी।

( लेखक के विचार निजी है)

KRISHNA

bhagavath geetha, karma, karm

कब कैसा नववर्ष हमारा?

You Might Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *