निराशा- हमारे अन्दर निराशा कब प्रवेश कर जाए-किसी को नहीं पता

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break-up imageनिराशा

Disappointment meaning in Hindi :  “निराशा”

राजकुमार:नई दिल्ली

निराशा‘ का मन के विचारों में प्रवेश करना और मन को  अपनी गिरफ्त में लेना, जीवन को जीने के संघर्ष से रोकना है! जीने का दूसरा नाम संघर्ष है। संघर्ष है तो जीवन है अन्यथा जड़-पत्थर है। जड़ पदार्थ में न जीवन है न संघर्ष।

हमारे अन्दर निराशा कब प्रवेश कर जाए-किसी को नहीं पता, हां इससे बचना चाहिए। अगर इसका प्रवेश हो गया तो आप के उन्नति व सफलता के मार्ग अवरुद्ध होने लगेंगे। निराशा के प्रवेश को रोकने के लिए आपको एक सतर्क जवान (सैनिक) की तरह काम करना होगा। जैसे एक सैनिक देश की रक्षा करते समय सदैव जागरुक व चौकस रहता है और दुश्मनकी  ओर से ज़रा सी हरकत होने से पहले ही उसे भांप लेता है और सतर्क होकर उसे नाकाम कर देता है, इसी प्रकार जैसे ही हमारे जीवन में निराशा का प्रवेश होने लगे तत्काल अपने को एक चुस्त सैनिक समझते हुए नि राशा के पीछे के कारणों पर अपनी बुद्धि बल से आक्रमण करदें तथा उसे परास्त करें, यदि आप ऐसा नहीं कर पाते तो दिन प्रति दिन वह तुम को घेरती चली जाएगी और धीरे-धीरे आप इतने घिर जाएंगे कि फिर आपके लिए इस घेरा बंदी से बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा, असम्भव नहीं। जीवन के प्रति आशावान रहिए, आगे की सोचिए।

Disappointment

निराशा का प्रवेश कई कारणों से होता–एक तो जो जब हम किसी कार्य की सोचते हैं और उस कार्य को  करते हैं लेकिन फल या रिजल्ट उस प्रकार से नहीं आता तो हम अपने को थका या हारा हुआ मान बैठते हैं तो ऐसे में निराशा को मन में प्रवेश करने का अवसर मिल जाता है। हमे तत्काल आगे की सोच को बढ़ाना होगा और निराशा को प्रवेश करने से रोकना होगा। फिर से अपनी शक्ति को संगठित कर, अपने अच्छे विचारों को एकत्रित कर आगे बढ़ना होगा- और फिरसे एक बार नए सिरे प्रयास करते हुए अपनी जीत निश्चित करनी होगी।

 

निराशा कैसे दूर करे?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सड,्गोस्त्वकर्मणि्।।’
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिये तू कर्मोंके फलका हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
फल की इच्छा न कर, कर्म करना ही तेरा जीवन है, फल की इच्छा से कर्म तो कर सकते हैं लेकिन फल मिलेगा या नहीं यह तू नहीं जानता, कोई नहीं जानता और जो फल  को जान कर कर्म करता है वह फल न मिलने पर निराशा में डूबजाता है और अगर केवल कर्म की दृष्टि से कर्म करेंगे तो कभी निराशा नहीं आएगी।

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