बदलते भारत की अनैतिक तस्वीर
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“बदलते भारत की अनैतिक तस्वीर”

-पार्थसारथी थपलियाल

“भा” का अर्थ है “ज्ञान” और “रत” का अर्थ है “लगा हुआ”। “भारत” शब्द का अर्थ है “ज्ञान में लगा हुआ” ज्ञान के अनुसंधान के प्रतिफल इस देश में वेद, उपनिषद्, पुराण, वेदांत, षडदर्शन और स्मृतियाँ समाज को सुव्यवस्थित करने में योगदान करते रहे। समाज में मर्यादा के रहते हुए अनैतिकता अपवाद स्वरूप रही। “पाप और पुण्य” दो शब्द सामाजिक अनुशासन के लिए पर्याप्त थे। आचरण की मर्यादा, व्यवहार की मर्यादा, संबंधों की मर्यादा का पालन हर कोई करता रहा।

पार्थसारथी थपलियाल
पार्थसारथी थपलियाल

महिलाओं को सम्मान स्वरूप माता- बहिन माना जाता रहा और इसीलिए कहा गया है – “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रम्यंते तत्र देवता” रामचरितमानस में लिखा है

“अनुज बधू, भगिनी सुत नारी। सुन सठ कन्या सम ए चारी।।

इन्हे कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई।।

प्रकृति भी अपनी मर्यादा में रहती है, लेकिन प्रकृति के साथ जब पुरुष ने दुर्व्यवहार किया तो उसका प्रभाव दिखाई दे रहा है। कहते हैं कि कितना ही पानी बरस जाय समूद्र अपनी मर्यादा नही छोडता, लेकिन मनुष्य ने पर्यावरण के साथ खिलवाड़ किया और सुनामी जैसी बरबादी देखने को मिल रही हैं। समूद्र ने मर्यादा लांघी।

दरअसल पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव अब भारत में सिर चढ़कर बोलने लगा है। उन्हे वही जीवन दर्शन लगता है जो वे जी रहे होते हैं। वे जैविक संबधों को विज्ञान की प्रयोगशाला में जाकर देखते हैं। और बायोलौजिकल नीड के नाम पर संबधों को तार तार कर देते हैं। इन्ही लोगों ने इस दर्शन को विकसित किया है कि अगर लडका सिगरेट पी सकता है तो लड़की क्यों न पिए या आदमी पब जा सकता है तो महिला भी जा सकती है।

भारतीय संविधान निर्माताओं ने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि इस आध्यात्मिक देश भारत में अभिव्यक्ति की अनैतिक स्वतंत्रता की इतनी आवश्यकता पडेगी। यह कैसी अभिव्यक्ति – जिसमें लोग धन कमाने के लिए देह प्रदर्शन या अनैतिक कर्म कर लेते हैं लेकिन वही लोग कोर्ट कचहरी में कुछ लोगों को घसीटने में शौहरत का रास्ता ढूंढते हैं। धन कमाते हुए उन्हे अनैतिक कर्म भी धार्मिक लगता है।

स्वतंत्रता की मर्यादा का उल्लंघन बाजारू बना मीडिया भी कर रहा है। भाषा इतनी फूहड हो गई है कि नैतिक, अनैतिक, व्यावहारिक, सामाजिक बोध ख़त्म कर दिया है। ये सब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हो रहा है। रामचरितमानस में लिखा है –

मारग सोइ जा कहुं जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।।

न्याय का देवता भी द्रवित हो गया है। व्यभिचार शब्द न्याय देवता को अन्याय लग गया। लिव इन रिलेशनशिप में जो लोग रहते हैं उनके रिलेशनशिप की मर्यादाएं क्या होंगी? गे रिलेशन, समलैंगिक संबंध अपराध की श्रेणी से बाहर होना हमारी किस नैतिकता को स्थापित करता है। हद तो ये हो गई स्थापित विवाह होने पर पति या पत्नी किसी पर स्त्री या पर पुरुष के साथ दैहिक संबंध बनाते हैं तो वह दण्डनीय अपराध नही होगा। नही सोचा न्याय के देवता ने कि भारतीय समाज परंपराओं पर आधारित है। यहां आस्थाओं के कारण पत्थरों को भी देवता मानकर पूजा जाता है। पति-पत्नी के मध्य आपसी समर्पण, निष्ठा, विश्वाश वे बंधन हैं, जिसके कारण समाज में कुछ नैतिकता बची हुई है। भारत में बहु संख्यक समाज हिन्दू है। विधिक स्तर पर इस समाज के लिए हिन्दू अधिनियम है। सामाजिक स्तर पर अग्नि को साक्षी (भगवान) मानकर अग्नि के सात फेरे लिए जाते हैं। लेकिन उसे वामांगी या अर्धांगिनी तभी माना जाता है जब सप्तपदी मे दोनों एक दूसरे के सात वचनों को स्वीकार कर लेते हैं। उसमें कन्या की ओर से एक वचन यह भी है –

परस्त्रियं मातु मां समीक्ष्य,

स्नेहम सदा चेन्मयि कान्त कूर्या।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं, बूते वच: सप्तमंत्रम कन्या।।

आप दूसरी महिलाओं को अपनी मां के समान देखने और मेरे साथ सदा प्रेम बनाये रखने का सातवां वचन स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामभाग में बैठने को तैयार हूँ।

इसके बाद वर द्वारा भी अपनी बात रखी जाती है जिसमे वर कहता है कि मैं आपकी सभी बातें स्वीकार करता हूँ लेकिन तुम्हें भी मेरे कुल की मर्यादाओं का पालन करना होगा –

यथा पवित्र चित्तेन, पातिव्रतत्य त्वया धृतं।

तथैव पालयिष्यामि पत्नी व्रतमहं ध्रुव।।

जैसे आपने पवित्र मन से पतिव्रत स्वीकार कर लिया है उसी तरह मै भी दृढता से पत्नी व्रत का निर्वहन करूंगा।

यह नैतिकता और मर्यादा पर आधारित जीवन के संचालन के लिए है, लेकिन विधिक स्तर पर वचन भंग होने पर दंड का विधान भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में निहित था जिसे सर्वोच्च न्यायालय अमान्य कर दिया है। जब कानून के अनुसार दंड की व्यवस्था नही रहेगी, तो समाज में व्यभिचार फैलेगा। संतानें वर्णसंकर होंगी। वैज्ञानिक स्तर पर डी एन ए मिलाने का संकट होगा और धार्मिक दृष्टि से वर्णसंकर सन्तान के कारण पितर नर्क को जाते हैं। श्रीमद भगवद्गीता में लिखा है –

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।

पत्ति पितरों ह्येषां लुप्त पिण्डोदकक्रिया।।

वर्णसंकर का होना कुल घातक है। लुप्त हुई पिण्ड क्रिया वाले इनके पितर भी गिर जाते हैं। आने वाले पितरों का भी नरकवास होगा।

यह सनातन मर्यादा है। व्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वेच्छाचारिता नही हो सकती। ये उस स्वतंत्रता का भयावह परिणाम है जिस कारण सामाजिक, सांस्कृतिक लोगों ने मौन धारण कर लिया है।

पावस आवत देखिए कोयल साधे मौन

“अब दादुर वक्ता भये, हमें पूछिए कौन?”

सच में मेरा भारत बदल रहा है उसकी तस्वीर ही नही तकदीर भी बदल रही है उसमें तर्क, वितर्क और कुतर्क को जो दबंगई के साथ प्रस्तुत करने में सबल है वही तस्वीर बदलने की ताकत रखता है।

रामचरितमानस में लिखा है-

सोइ सयान जो प्रधान हारी।

जो कर दंभ सो बड़ आचार।।

जो कह झूठ मसखरी जाना। कलियुग सोइ गुणवंत बखाना।।

दुख ये है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मार्ग से सत्ता पर यदि अनाचारी, कदाचारी और दुराचारी लोग स्थापित होते हैं तो वास्तव में ही भारत की तस्वीर बदल ही नहीं जाएगी बल्कि ढूंढनी भी मुश्किल हो जाएगी। इन पहलुओं पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है।

भारत को सही सन्दर्भ में समझने के लिए भारतीय दृष्टि की आवश्यकता है। पाश्चात्य संस्कृति से विकसित लोग इससे अच्छा क्या कर सकते हैं?

(लेखक के विचार निजी है)

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